उत्तरकाशी में लापता पत्रकार की लाश बरामद
9 दिन बाद मिला शव, उठे सवाल – क्या सच की आवाज़ दबाई गई?
उत्तरकाशी।
उत्तराखंड की शांत वादियों में एक सनसनीखेज़ वारदात ने पत्रकारिता जगत को हिला कर रख दिया है। स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे राजीव प्रताप सिंह, जो 18 सितंबर की रात रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हो गए थे, उनका शव 10वें दिन बरामद हुआ।
भागीरथी नदी किनारे से कार तो पहले ही मिल गई थी, लेकिन राजीव का कोई सुराग न मिलने से परिजनों और पत्रकार समुदाय की चिंता गहराती चली गई। नौ दिन तक चला सर्च ऑपरेशन जब शव मिलने की ख़बर में बदल गया, तो परिजनों की आंखें नम हो गईं और पत्रकार बिरादरी में आक्रोश की लहर दौड़ गई।
सच लिखने की सजा?
राजीव प्रताप सिंह लंबे समय से स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं के खिलाफ लगातार लिखते-बोलते रहे। परिवार का कहना है कि उन्हें कई बार धमकियां भी दी गईं थीं। यही कारण है कि शव बरामद होने के बाद यह सवाल और भी बड़ा हो गया है –
👉 क्या यह सिर्फ एक हादसा है या फिर सच बोलने की सजा?
सरकार पर दबाव, गहन जांच के आदेश
पत्रकार की मौत के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गहन और निष्पक्ष जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन पत्रकारों का कहना है कि केवल जांच के आदेश पर्याप्त नहीं, बल्कि अपराधियों को तुरंत गिरफ्तार कर पत्रकार सुरक्षा कानून लागू किया जाना चाहिए।
पत्रकार बिरादरी का आक्रोश
उत्तरकाशी से लेकर देहरादून तक पत्रकारों ने कड़ा रोष जताते हुए कहा –
“जब आवाज़ उठाने वालों को ही चुप करा दिया जाएगा, तो समाज का सच कौन सामने लाएगा? अपराधी अब अपराध छिपाने के लिए पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं, जो देवभूमि उत्तराखंड के लिए गहरी चिंता का विषय है।”
शोक और सवालों का साया
राजीव के घर पर मातम पसरा है। छोटे बच्चों की मासूम निगाहें हर आने-जाने वाले से एक ही सवाल कर रही हैं – “पापा क्यों नहीं लौटे?” यह दृश्य हर किसी की आंखें नम कर रहा है।
पत्रकारिता जगत अब सिर्फ शोक में नहीं, बल्कि सवालों से घिरा है –
- क्या सच्चाई लिखना अब जानलेवा बन चुका है?
- कब तक पत्रकारों की आवाज़ दबाई जाती रहेगी?
- और कब मिलेगी उन्हें न्याय व सुरक्षा?
चीफ एडिटर राहुल दुमका







